कौन है भगवान ?
आज हम आपके समक्ष श्री राम जी का विस्तृत वर्णन करते है और आपकी आंखों पर लगी पट्टी को हटाने का प्रयास है तथा सोचने की इच्छा जाग्रत करते है की श्रीराम उर्फ विष्णुजी भगवान है या देवता।
श्री राम जी के भगवान न होने के अनेको प्रमाणों में से कुछ प्रमाण आपके समक्ष रखता हु :-
1. सीता जी की खोज में श्री राम जी तथा श्री लक्ष्मण जी वन-वन भटक रहे थे तो यहां पर सर्वप्रथम यही प्रमाण है की अगर श्री राम जी उर्फ विष्णु अवतार अगर भगवान होते तो उन्हें वन-वन भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। ब्रह्मा जी विष्णु जी तथा शिव जी इन तीनों की बुद्धि काल ब्रह्म के हाथ में हैं। वह जब चाहे इनकी बुद्धि ऑन कर देता है और जब चाहे ऑफ कर देता है, क्योंकि जब 14 वर्ष के वनवास के दौरान सीता जी को रावण अपहरण करके अपनी लंका में ले गया था।
तब शिव तथा पार्वती जी ऊपर से राम जी को, जो अति व्याकुल थे सीता जी के वियोग में, देख रहे थे। जब शिव जी ने पार्वती को बताया कि यह राम जी श्री विष्णु जी के अवतार हैं तब पार्वती जी को विश्वास नहीं हुआ तो उन्होंने शिव जी के मना करने पर भी श्री राम जी की परीक्षा लेनी चाही और वन में श्री राम के सामने सीता जी के रूप में प्रकट हो गयी। तब काल(ब्रह्म) ने श्री राम जी की बुद्धि को तुरंत On कर दिया। जिससे श्री राम जी को पता चल गया की ये तो पार्वती देवी है। तब सीता रूप में आई पार्वती को बहुत लज्जा हुई और वे अंतर्ध्यान हो गयी। तो अब यहां पर पूर्णतः स्पष्ट हो गया है की श्री राम जी भगवान नही थे, अगर होते तो उन्हें सीता जी के वियोग में वन-वन भटकना नही पड़ता तथा जटायु पक्षी को बताने की जरूरत नही पड़ती की सीता जी को लंका का रावण अपहरण कर ले गया है।
2. जब श्री राम जी ने हनुमान जी द्वारा लाए गए सीता के कंगन को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए और समुन्द्र पर पुल बनवाने का विचार किया। तब श्री राम जी तीन दिन तक घुटनों पानी में खड़े रहे और समुद्र से रास्ता देने की प्रार्थना करते रहे, परंतु समुद्र टस से मस नही हुआ, इससे रामचंद्र जी तथा सर्व उपस्थित योद्धा हनुमान सहित महा:दुखी हुए। अब मेरे इस रिप्लाई को पढ़ने वाले सभी भाई-बहन जरा सोचिए की क्या भगवान कभी किसी दूसरे पर आश्रित होता है ? और क्या भगवान अपनी सिद्धि से समुद्र पर रास्ता भी नहीं बना सकता ? बहुत परेशान होने पर रामचंद्र जी ने अग्निबाण निकाला तब समुद्र विप्र रुप धारकर श्री राम जी के सामने करबद्ध होकर खड़ा हो गया व समुद्र ने राम जी से कहा की आपकी सेना में नल नील नाम के दो सैनिक हैं उनको उनके गुरु जी का आशीर्वाद है उनके हाथों से पत्थर भी पानी के ऊपर तैर सकते हैं तब नल नील से पत्थर डालकर दिखाने को कहा तो नल नील ने अपनी महिमा चाही और गुरु को याद नहीं किया जिस कारण से ऋषि मुनींद्र जी(नल-नील के गुरु) ने उनकी शक्ति छीन ली, पत्थर डूब गए। समुंद्र ने उनकी गलती बताइ। तब नल नील ने अपने गुरु जी को याद किया जो की इन तीनों लोकों के पालनहार, पूर्ण ब्रह्म, कबीर परमेश्वर हैं जो इन तीनों लोकों में चिटी से लेकर हाथी तक के सर्व प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं। अब आपको ज्ञात कराते है की श्रीराम उर्फ विष्णु जी के पिता काल(ब्रह्म)/ज्योति निरंजन ने पूर्ण पिता परमेश्वर कबीर साहेब से आशीर्वाद लिया था की मेरा अंश विष्णु त्रेता युग में रामचंद्र नाम से राजा दशरथ के घर जन्म लेगा। उसको बनवास होगा। उसके साथ उसकी पत्नी सीता भी होगी। उसे एक राक्षस लंका नगरी में उठाकर ले जाएगा। तब रामचंद्र समुद्र के ऊपर पुल बनाना चाहेगा, वह नहीं बना पाएगा। आप वह पुल बनवाना। इसी वचन का पालन करने के लिए ऋषि मुनीन्द्र रूप में परमेश्वर कबीर जी सेतुबंध पर प्रकट हो गए और आते-आते पर्वत के चारों और अपनी डंडी से रेखा अंकित कर गए। श्री रामचंद्र जी ने अपनी समस्या बताई तथा विनम्र भाव से अपने कार्य की सिद्धि के लिए आशीर्वाद मांगा। परमेश्वर ने कहा मैंने सामने वाले पर्वत के चारों और रेखा लगाई है उसके अंदर-अंदर के पत्थर लकड़ी से भी हल्के कर दिए हैं, वे डूबेंगे नहीं। इस तरह समुद्र पर पुर्ण परमात्मा ने पुल बनवाया।
3. जब श्री राम की सेना पर नाग फ़ांस शस्त्र छोड़ा गया। जिस कारण से श्री राम, हनुमान, जाम्बवंत, सुग्रीव, अंगद सहित सर्व सेना नागों(सर्पों) द्वारा बांध दी गई। सर्व लिपट गए। हाथों को भी शरीर के साथ जकड़ दिया। तब गरुड़ को बुलाया गया। गरुड़ ने सर्व नाग काटे। तब सर्व सेना तथा श्री राम बंधन मुक्त हुए। अब सोचनीय विषय यह है की जिसको आप भगवान मान बैठें हो, वे स्वयं नाग के बन्धन में बंधे पड़े है और उन्हें उनका वाहन गरुड़ देव ही बन्धन से छुड़वाने आया है। अतः सिद्ध है की श्री राम जी भगवान नही है।
4. रावण वध के 20 दिन बाद 14 वर्ष की अवधि पूरी करके श्री राम, लक्ष्मण और सीता पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या नगरी में आए। भरत ने अपने भाई श्री रामचंद्र जी को राज्य लौटा दिया। कुछ वर्ष उपरांत राजा रामचंद्र जी रात्रि में अयोध्या की गलियों में विचरण कर रहे थे। एक घर से उसकी आवाज आ रही थी। राजा रामचंद्र जी ने निकट जाकर वार्ता सुनी। एक धोबी की पत्नी झगड़ा करके चली गई थी। वह दो-तीन दिन अपने बहन के घर रही, फिर लौट आई। धोबी उसकी पिटाई कर रहा था कि कह रहा था। कह रहा था कि निकल जा तू मेरे घर से, तू दो रात बाहर रह कर आई है। मैं तेरे को घर में नहीं रखूंगा। तू कलंकित है। वह कह रही थी, मुझे सौगंध भगवान की। सौगंध है राजा राम की, मैं पाक साफ हूं। आप ने मारा तो मैं गुस्से से अपनी बहन के घर गई थी, मैं निर्दोष हूं। धोबी ने कहा कि मैं दशरथ पुत्र रामचंद्र नहीं हूं जो अपनी कलंकित पत्नी को घर ले आया जो वर्षों रावण के साथ रही थी। अयोध्या नगरी के सब लोग-लुगाई चर्चा कर रहे हैं। क्या जीना है ऐसे व्यक्ति का जिसकी पत्नी अपवित्र हो गई हो। राजाराम ने धोबी के मुख से यह बात सुनी तो कानों में मानो गर्म तेल डाल दिया हो। श्रीराम जी ने अगले ही दिन सीता जी को घर से निकलने का आदेश दे दिया कारण भी बता दिया। सीताजी ने विनय भी की कि है, हे स्वामी! आपने मेरी अग्नि परीक्षा भी ली थी। मैं भी आत्मा से कहती हूं, रावण ने मेरे साथ मिलन नहीं किया। रावण को एक ऋषि का शॉप था कि तू किसी परस्त्री से बलात्कार करेगा तो तेरी उसी समय मृत्यु हो जाएगी। अब मेरे मित्रो आप सभी कि आंखों से पर्दा हट गया होगा की श्री राम भगवान हो ही नही सकते, अगर वे भगवान होते तो किसी धोबी के कहने पर अपनी पवित्र पत्नी सीता जी को घर से बाहर नही निकालते।
अब आप सभी को असली राम से अवगत कराया जाता है की असली राम तो वह है जो जो चारो युगों में अपनी लीला करने आते है। सतयुग में सतसुकृत जी नाम से, त्रेतायुग में ऋषि मुनीन्द्र जी नाम से, द्वापरयुग में करुणामय नाम से तथा कलयुग में परमपिता कबीर परमेश्वर स्वयं एक कवि के रूप पृथ्वी पर कमल के फूल पर प्रकट हुए।
एक राम घट घट मे बोले,एक राम दशरथ घर डोले l
एक राम का सकल पसारा,एक राम त्रिभुवन से न्यारा ll
राम राम यह जगत बखाना, आदि राम कोई बिरला जाना।।
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प्रतिदिन साधना चैनल पर शाम को 07:30 से 08:30 बजे तक संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन अवश्य सुने।




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